मकड़ी बुनती है जाल
कारीगरी है बेमिसाल
अजीबो-ग़रीब उसकी है तकनीक
दिखने में खूबसूरत और बारीक
क़ाबिले-तारीफ़ है हुनर
कैसे ना करें कोई उसकी कदर
मकसद से मकड़ी बुनती है जाल
उसके बिना हो जाए वो बहाल
मकड़ी को भी तो है जीना
उसको भी तो है अपना भूक मिटाना
तरीक़ा है कुद्रती, जाल को बुनना
गिरह में आए कीड़ो को खाना
पर आदमी जो बुनता है जाल
क्या है उसका मकसद और क्या ख़याल !
अनदेखी जाल बेईमानी का
अनकही जाल बेवफ़ाई का
अनसुनी जाल बद्दिमागि का
बदसूरत जाल औरों की हसरतों पर
अफ़सोस होता है इंसान की इस फ़ितरत पर
नादानी में या फिर जानके
बुनता है इंसान यह भूलके
के वो एक इंसान है, मकड़ी नही !
जाल बुनना इंसान के लिए क़ुद्रती नही !
तकनीक खूबसूरत उसके पास और भी
जिससे बना सकता है वो भी
एक ऐसा जहाँ सबके बसने के लिए
औरों को जीने दे और खुद भी जिए
मकड़ी अपने बुने हुए जाल में आमतौर पे नही है फसती
अक्सर अपने बनाया हुए जाल में है फस्ता, इंसान है ऐसी हस्ती

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