FARZ AUR MOHABBAT (DUTY AND LOVE)

May 13 2008  | Views 113 |  Comments  (2)
Tags:

फ़र्ज़ और मुहब्बत

बचपन में जो कूट कूट कर भरा जाता है
जवानी में वो धीरे धीरे छलकता रहता है
बुढ़ापे मैं उस फसल का फल वो खाता है
ऊम्र निकल जाती, इंसान यह समझ नही पाता है

तभी तो, मा बाप गर नही निभाते अपना फ़र्ज़
पनपती ही बत्तम्मीzइ और पलते है ख़ुदग़र्ज़
रखते नही गर मा बाप प्यार और यकीन की बुनियाद
यक़ीनन उनके बच्चे करें दूसरों को बर्बाद

देखा हो तो, जाने क्या होती रिश्तों की पहचान
इज़्ज़त हर रिश्ते का हो, हर बंदे का अरमान
गुरूर से अंधे होकर, कुछ ऐसे तंग दिल
मेहरबान हो बहार, तो भी खिलना उनका मुश्किल

दर्द के इस माहौल में पलकर बड़े होते जो
दवा भी दे कोई तो उसे ज़हर समझे वो
दुआ की भी नही रखते वो पहचान
यकीन नही आता, जहाँ में बसें है ऐसे इंसान

जब अंधेरे में रहने की हो जाए आदत
उजाले में जीने की कहाँ रहती हिम्मत
बेहालि में पिटकर जीने की आदत हो जाए
तो मोहब्बत और वफ़ा को कहाँ कोई समझ पाए

अपनी बदनसीबी और ज़िल्लत से बेचैन
बदले की आग में लूटे दूसरों का चैन
आकर इनके लपेटे में हो रहा गर कोई बर्बाद
खुदा उन्हे सलामत रखे, करो यह फरियाद

© downtoearth., all rights reserved.

Recommend

2
votes
votesEnjoyed this post? Cast your vote and recommend to other readers

Leave a comment

Use rich text editor:

In case you missed...

Some other recent posts by downtoearth

Advertisement


Mars, Female
Member Since Feb 11 2008
© 1998-2008 Copyright Sulekha.com Connecting Indians Worldwide, All Rights Reserved.