मृगतृष्णा
जब किसी का एक ऐसे संसार में वास हो,
जहाँ हर पल,
माता और पिता की ममता की छाया हो,
भाई और बहन का दुलार हो,
हर क्षण परमात्मा की कृपा का एहसास हो,
निरंतर श्रद्धा और नम्रता का अभ्यास हो,
अपनी योग्यता के अनुसार लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास हो,
समृद्धि और संपन्नता के लिए आभारी हो,
सभ्यता का व्यवहार हो,
हर मनुष्य के प्रति शिष्यता का व्यवहार हो,
हर संबंध का उचित स्थान और सम्मान हो,
आत्मबल और आत्मविश्वास का प्रोत्साहन हो,
तो कैसे ना वह खुशियों का भंडार हो,
जिसके जीवन के हर पहलू में साथियो का भरमार हो,
क्यों ना उसमे संपूर्ण जीवन की चाह हो,
जब उसने पाया अपने को प्यार की राह पर,
चल पड़ी अपनी वही जीने की चाह और विश्वास लिए,
हम सफ़र के साथ वैसा ही संसार बसाने के लिए,
अरे यह क्या!!
एक अलग ही दुनिया का हो रहा था उसे आभास,
विचलित हो उठता मन जब होता यह एहसास,
की उसकी इस दुनिया में नही है कोई उसके माता-पिता
और भाई बहन जैसा,
पर उनकी याद लेकर उनके दिए हुए अमूल्य
सीख के सहारे करती रही प्रयास,
जूझ रही थी मन में लिए प्यार और विश्वास,
पर उसे था यह एहसास,
की उसका बन रहा कुछ अलग ही प्रकार का संसार,
समृद्धि और संपन्नता का नही था कोई नाम या निशान,
उसकी इस दुनिया में मुखौटें पहने हुए थे इंसान,
दुहरा व्यवहार और अनादर का करना पड़ता उसको सामना,
किसी के अहंकार के लिए अपनी योग्यता को कुचलती हुई,
उस संसार में अपनी श्रद्धा की आहुति चढ़ाती हुई,
वह अब सोचती होगी की यह किस तरह का संसार है,
यह किस तरह का संसार है!!!!
जाने कौन उसे यह बताएगा की,
समाज हमारा बसा हुआ है कई परतों में,
धन और विद्या की उपलब्धि के आधार पर,
समाज में लोगों को डाला जाता है श्रेणियों में,
अगर बसाना ही है संसार तो,
जानो परखो और रहो अपनी ही श्रेणी के आसपास,
क्योंकि वास्तविकता यही है, जब बहुत तीव्र गति से,
नीचे गिरे कोई तो चोट गहरी लगती है,
जाने क्या मिले नीचे दलदल में जा गिरे या
फिर बंजर पे सिर फटे!!!!
जाने क्यों लगता है की टूटेगा नही उसका विश्वास,
संभाले रहेगी वह अपनी खुशियाँ और लेकर अपनो का सहारा
वह बसा सकेगी अपना सपनो का संसार!!!

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